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मैं

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मैं-बस मैं हूँ, सबसे पहले, कुछ और बनने से पहले - बस मैं ही तो हूँ!  एक स्त्री, साधारण सी स्त्री, भिन्न भिन्न भूमिकाएं निभाती हुई - बस मैं एक ही तो हूँ!  अपने सभी निर्णयों का स्वयं करती हूँ निर्धारण, न हूँ कोई अबला - सबल, साहसी मैं ही तो हूँ!  पढ़ी लिखी, भविष्य की पीढ़ी को सुदृढ़ करती हुई - सक्षम, अनुशासित मैं ही तो हूँ!  कितने साथी कितने दोस्त मिले मुझे इस संसार में -  उन में से किसी न किसी की सहकर्मी, सहयोगी, सहेली मैं ही तो हूँ! अपनी भावनाओं को छुपाती नहीं, उन्हें अपनी शक्ति बनाती हुई - कोमल, भावुक मैं ही तो हूँ! सब ही का ध्यान धरती हूं, आज से मैं स्वयं का भी ध्यान धरूंगी, स्वार्थी नहीं—आत्म निर्भर, स्वावलंबी मैं ही तो हूँ! क्यूँ करूँ किसी और से अपनी तुलना? इस समस्त संसार में एक अनूठी, अनोखी मैं ही तो हूँ! मैं बस मैं हूँ —एक समान्य सी स्त्री, कितनी परतें, कितनी प्रतिभाएं, कितने रिश्ते समेटे हुए — संपूर्ण, सशक्त मैं ही तो हूँ! 

क्यूँ मायूसी

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क्यूँ ऐसे खामोश बैठे हो, किस लिए हो यूँ गुमसुम लगता है जैसे कि खुद से ही कुछ रूठ गए हो तुम ग़र कोई चाहत पूरी नहीं हुई तो यूँ परेशान हो गए  सिर्फ़ अपनी ही नहीं मेरी तरफ से भी टूट गए हो तुम  वक्त का पहिया रुकता नहीं - अपनी रफ़्तार से चलता रहता है  मुश्किलों के दौर ज़रा खिंच क्या गए, मानों थक गए हो तुम  हौसला रखो, मेहनत करो, कामयाबी का भी दौर आएगा  क्यूँ नाउम्मीदियों के भँवर में यूँ उलझ गए हो तुम  शुक्रिया करो ऊपर वाले का कि बस इतना ही इम्तिहान लिया है  जब हो जाओ कामयाब फिर से, तो करना शुक्रिया कि उठ गए हो तुम  Image courtesy : https://images.app.goo.gl/hD3pnzUmiU29MnMb7